जैन जिनवाणी संग्रहालय का विवरण

समय, गति और बदलता दौर, ये सब विधि के विद्यान हैं | सतयुग से लेकर अगर
कलयुग के दौर की ओर देखा जाए, तो यह भी ज्ञात होता है कि मनुष्य और उसकी जीवन
शैली कितनी बदल चुकी है । ओर इतिहास इस बात का साक्षी भी है, की इन सभी युगों में
जैनधर्म, जिनशासन और साहित्यों को मिटाने कितनी बार भिन्न-भिन्न तरीके से प्रयास
हुए है वर्तमान में जिस तरह दौर बदल रहा है और श्रावको का धर्म के प्रति रूचि और
लगाव कम होता जा रहा है | यह देखकर लगता है कि बदलते दौर के हिसाब से ग्रन्थों,
साहित्यों और जिनआगमों का संरक्षण का कार्य भी होना चाहिए और श्रावकों में धर्म के
प्रति रूचि बढे इसका प्रयास भी होना चाहिए । सब कुछ मजबूरी है पर ्यदि जीवन को
सफल बनाना याहते हो तो धर्म जरुरी है | कहते हैं – जहाँ चाह है, वहाँ शह है। आज का व्यक्ति
धर्म से नहीं जुड़ पा रहा है । कॅसे जुड़े यह प्रश्न है ! तो आवश्यकता आविष्कार की जननी है।
व्यक्ति जहाँ औषतिकता में है वहाँ उसे पुय कार्यों में उलझा दें | सबसे अच्छा तरीका है –
स्वाध्याथ एवं शास्त्र सुरक्षा /इसी संकल्प हेतु, इस उिजीटल और तेजी से बदल ते दौर में.
धर्म प्रभावना हेतु एक वेबसाइट का निर्माण किया जा रहा है । जिसका नाम है –
JainJinvani. org. आज व्यक्ति इस वैज्ञानिक युग की ओर अग्रसर होता जा रहा है । याद
यदि उससे पूछा जाये कि तुमने भारत देश में जन्म लिया तो प्राचीन महापुरूषों का इतिहास
क्या है? तो वह बता नहीं पायेगा| यहाँ तक कि जिस धर्म में हमने जन्म लिया उसके बारे
में भी हमें जानकारी नहीं होती है और यदि इनसे फिल्मी दुनिया के बारे में पूछा जाये तो
कोई भी बाल, युवा, युवती सभी बता देंगे किर ऐसे भौलिक शुग में भी जैन धर्म के जो
महत्वपूर्व शास्त्रों का संग्रह किया गया है यह सभी साधु व श्रावकों को उपयोगी सिद्ध होंगे ।
क्योंकि उसे जैनागम जानने के लिए अनेक ग्रन्थों की जरूरत होती है । जिनवाणी अर्थात्
जिनेन्द्र भगवान के मुख से निकली वाणी, ज्ञान का जिसमें वर्णन है वही जिनवाणी हैं।
तीर्थकर भगवान ने दिव्य दृष्टी से जो देखा हे उसको अपनी ध्वनी से प्रसारण किया ।
तीर्थकर की वागी अर्थात आगम या प्राचीन सत् साहित्यों को कायम श्खने हेतु
में शुरूदेव के शुभाशीष से डिजीटल मीडिया में सुरक्षित रखवाने का प्रयास कर रही
व्योंकि जो हमारे प्राचीन आयार्थ धरोहर के रूप में ग्रन्यों का लेखन करके गये हैं । उन
शास्त्रों का सदा अभ्ययन होता रहे और सभी साधू व श्रावकों को एक जगड आसानी
से शास्त्र मिल सकें । इसी उद्देश्य से सभी संतों, विद्वानों के द्वारा श्चित, संपादित या
संकलित शास्त्रों का संग्रह किया गया है इसमें किसी भी पंथ आम्नाय आदि का समावेश
नहीं हैं|अपितु जैन शा्त्रों का (आगम) का संग्रह है | सभी संतों से मैं यही भावना रखती
हूँ कि आप सभी ने “जैन जिनवाणी संग्रहालय” में जो शास्त्र भेजे हैं । उनकी सुरक्षा
सदा कायम रहे एवं जिनवागी का प्रयार – प्रसार होता रहे ऐसा मुझे आशीष वसंबल
देते रहे ।
jainjinvani.org

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